उत्तराखंड।
रिंगाल, घास-फूस और बाँस से बनने वाली टोकरी, डलिया, सूप, चटाई सिर्फ़ सामान नहीं – हमारे बुजुर्गों की समझदारी और प्रकृति से जुड़ाव का प्रतीक हैं।
प्लास्टिक के इस दौर में ये हस्तशिल्प हमें याद दिलाते हैं कि सुंदरता टिकाऊ भी हो सकती है। 100% प्राकृतिक, मजबूत और पर्यावरण के मित्र।
जरूरत है हम सब इन्हें अपनाएं और हमारे स्थानीय कारीगरों को उनका सही सम्मान और बाजार दिलाएं। एक टोकरी खरीदना सिर्फ खरीददारी नहीं, पहाड़ की संस्कृति को बचाना है।
आपने आखिरी बार रिंगाल की बनी कौन सी चीज इस्तेमाल की थी?
