देहरादून। प्रादेशिक सेना की 127 टीए बटालियन गढ़वाल राइफल्स, जिसे ‘गढ़वाल ग्रीनर्स’ के नाम से भी जाना जाता है, ने गढ़ी कैंट, देहरादून में एक ऐतिहासिक और भव्य सांस्कृतिक समारोह का आयोजन किया। यह समारोह उत्तराखंड के लोक-संस्कृति के संवाहक और पद्मश्री से सम्मानित जागर सम्राट डॉ. प्रीतम भरतवाण के जन्मदिन के उपलक्ष्य में सैनिकों और उनके परिवारों के लिए आयोजित किया गया था।
इसी मंच से डॉ. प्रीतम भरतवाण और उनकी टीम ने अपनी नई और महत्वाकांक्षी वैश्विक पहल ‘कल्चर फॉर ह्यूमैनिटी’ (संस्कृति इंसानियत के लिए) का औपचारिक शुभारंभ किया।
इस अवसर पर उनके साथ उनकी कोर टीम के प्रमुख सहयोगी सच्चिदानंद सेमवाल, मस्तु दास, शक्ति प्रसाद भट्ट, अनिरुद्ध रैथवान, राय सिंह रावत, जीवन जोशी, राकेश सिंह, विजेंद्र उनियाल सहित कई अन्य गणमान्य लोग और सेना के वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे।

क्या है ‘कल्चर फॉर ह्यूमैनिटी’ अभियान का उद्देश्य?
डॉ. प्रीतम भरतवाण ने अपने संबोधन में इस अभियान के तीन मुख्य स्तंभों के बारे में बताया
1. वैश्विक शैक्षणिक मंच: डॉ. भरतवाण ने घोषणा की कि आज के बाद से वे देश और दुनिया के किसी भी विश्वविद्यालय, अकादमी या मंच पर जो भी व्याख्यान देंगे, ढोल वादन, जागर, पवाड़ा या लोक कला का कोई भी सत्र करेंगे, वह सब ‘कल्चर फॉर ह्यूमैनिटी’ के बैनर तले ही होगा। इसका मकसद उत्तराखंड की लोक-विद्या को एक वैश्विक शैक्षणिक पहचान देना है।
2. तकनीक और संस्कृति का संतुलन: उन्होंने कहा कि आज हम विज्ञान, AI और तकनीक के युग में बहुत तेजी से आगे बढ़ रहे हैं, लेकिन इसी तेजी में हमारे पारिवारिक मूल्य, सामाजिक ताना-बाना और मानवीय संवेदनाएं बिखर रही हैं। तकनीक हमें साधन देती है, लेकिन संस्कृति हमें जीने का सलीका और इंसानियत सिखाती है। यह अभियान इसी संतुलन को स्थापित करने का काम करेगा।
3. संस्कृति से इंसानियत का निर्माण: उनका मूल मंत्र है – “शिक्षा और तकनीक करियर का निर्माण करती हैं, किंतु लोक संस्कृति और जीवन मूल्य एक बेहतर इंसान का निर्माण करते हैं।” इसी सोच को वे अब विश्व स्तर पर लेकर जाएंगे।

सेना के ‘भागीदारी और जिम्मेदारी’ अभियान से जुड़े डॉ. भरतवाण
इस समारोह का एक और महत्वपूर्ण पहलू पर्यावरण संरक्षण से जुड़ा था। प्रादेशिक सेना की 127 टीए गढ़वाल राइफल्स पहाड़ों में पारिस्थितिकी पुनर्स्थापन (Ecological Restoration) के लिए ‘भागीदारी और जिम्मेदारी’ नाम से एक विशेष अभियान चला रही है।
सेना के उच्च अधिकारियों ने इसी मंच पर पद्मश्री डॉ. प्रीतम भरतवाण को इस अभियान का सांस्कृतिक दूत नियुक्त किया। अब डॉ. भरतवाण अपनी जागर और लोकगीतों के माध्यम से लोगों को पर्यावरण संरक्षण, हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र को बचाने और प्राकृतिक संसाधनों को आने वाली पीढ़ी के लिए सुरक्षित रखने के प्रति जागरूक करेंगे।
डॉ. भरतवाण ने सैनिकों से आह्वान किया कि वे इस पहल के साथ मिलकर पर्यावरण संरक्षण की जिम्मेदारी उठाएं।

जागर और पवाड़ा से मंत्रमुग्ध हुए जवान
कार्यक्रम के अंत में डॉ. प्रीतम भरतवाण और उनके दल ने उत्तराखंड की समृद्ध परंपराओं की झलक पेश की। पारंपरिक जागर की दिव्य ध्वनि, ऐतिहासिक पवाड़ा गाथाओं और लोकगीतों पर हुई प्रस्तुतियों ने गढ़ी कैंट में मौजूद सैकड़ों सैनिकों और उनके परिवारों को अपनी जड़ों से जोड़ दिया।
सेना के वरिष्ठ अधिकारियों ने लोक संस्कृति को वैश्विक मंच पर ले जाने के लिए डॉ. भरतवाण के इस योगदान की जमकर सराहना की और कहा कि यह आयोजन संस्कृति और प्रकृति के संरक्षण के बीच एक सुंदर सेतु है।
