नौले-धारों से आंगन तक गूंज रहे लोकगीत, झोड़ा-चांचरी और छोलिया की थाप; कुमाऊं की लोकसंस्कृति को जीवंत कर रहा है सातों-आठों का पर्व
बागेश्वर। कुमाऊं की पहाड़ियों में सावन की हरियाली जब अपने पूरे शबाब पर होती है और गांव-घरों के आंगन लोकगीतों से गूंजने लगते हैं, तब सातों-आठों का रंग धीरे-धीरे पूरे पहाड़ पर चढ़ने लगता है। यह पर्व महज देवी-देवताओं की पूजा का अवसर नहीं, बल्कि पहाड़ की सामूहिक स्मृति, रिश्तों की आत्मीयता और सदियों पुरानी लोकपरंपराओं का जीवंत उत्सव है।
सातों-आठों की शुरुआत बिरुण पंचमी से होती है। सुबह होते ही महिलाएं समूह में पारंपरिक नौलों और धारों की ओर निकलती हैं। वहां बिरुड़ धोने की परंपरा निभाई जाती है। धुले हुए बिरुड़ तांबे के पात्र में भिगोकर पूजा के लिए सुरक्षित रखे जाते हैं। देखने में यह एक सामान्य-सी रस्म लग सकती है, लेकिन इसके भीतर पहाड़ की प्राचीन जल-संस्कृति, सामूहिक श्रम और प्रकृति के प्रति सम्मान की गहरी भावना छिपी है।
गमारा तैयार करने की परंपरा
पर्व की तैयारियों में गौरा यानी गमारा की प्रतिमा तैयार करना सबसे महत्वपूर्ण अनुष्ठानों में से एक है। स्थानीय वनस्पतियों और अनाज से गमारा का स्वरूप तैयार किया जाता है। धान की पौध, सौं, तिल और बलो घास जैसी स्थानीय सामग्रियां इस परंपरा को सीधे पहाड़ की मिट्टी और प्रकृति से जोड़ती हैं।
घर की सबसे बुजुर्ग महिला इस कार्य का नेतृत्व करती हैं और परिवार की अन्य महिलाएं उनका सहयोग करती हैं। प्रतिमा तैयार करते समय गौर-महेश के लोकगीत गूंजते हैं। इन गीतों में केवल पूजा की भावना नहीं होती, बल्कि एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक लोकज्ञान और सांस्कृतिक विरासत के हस्तांतरण की पूरी कहानी छिपी होती है।
लोककथाओं में दांपत्य जीवन के रंग
गमारा और महेश्वर से जुड़ी लोककथाओं में दांपत्य जीवन के अनेक रंग देखने को मिलते हैं। इनमें प्रेम है, रूठना-मनाना है, संवाद है और कहीं-कहीं पहाड़ की सहज हास्य-परंपरा भी दिखाई देती है। यही लोककथाएं सातों-आठों को केवल धार्मिक अनुष्ठान न रहने देकर मानवीय संवेदनाओं से जोड़ती हैं।
आंगन बन जाता है सामूहिक उत्सव का केंद्र
सातों-आठों की सबसे बड़ी ताकत इसकी सामूहिकता है। पर्व के दौरान घर का आंगन सिर्फ घर का हिस्सा नहीं रहता, बल्कि पूरे समाज के मिलने-जुलने का केंद्र बन जाता है।
महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा में सजती हैं। झोड़ा-चांचरी और झुमटा के गीत वातावरण में मिठास घोलते हैं। लोकनृत्यों की थाप के साथ उत्सव का रंग गहरा होता जाता है। कहीं छोलिया की धुन सुनाई देती है तो कहीं महिलाओं के सामूहिक स्वर पहाड़ की सांस्कृतिक पहचान को जीवंत कर देते हैं।
नगर और आसपास के क्षेत्रों में भी दिखा उत्साह
बागेश्वर नगर और आसपास के क्षेत्रों में भी महिलाओं ने मां गौरा की प्रतिमाएं स्थापित कर विधि-विधान से पूजा-अर्चना की। पारंपरिक लोकगीतों के साथ झोड़ा-चांचरी और छोलिया नृत्य ने पर्व की रौनक बढ़ाई।
गौरा माता के लोकगीतों में स्थानीय जीवन, आस्था और भावनाओं की वह मिठास सुनाई देती है, जो लिखित इतिहास की अपेक्षा कहीं अधिक प्रभावी ढंग से लोकस्मृति को पीढ़ियों तक सुरक्षित रखती है। इससे पहले पितरौटा में मां गौरा का विग्रह तैयार कर पारंपरिक वेशभूषा में झांकी भी निकाली गई।
नौले-धारों से जुड़ी है परंपरा
सातों-आठों की एक महत्वपूर्ण कड़ी पारंपरिक जलस्रोत नौले और धारों से भी जुड़ी है। महिलाओं ने इन जलस्रोतों पर बिरुड़ धोए और पूजा-अर्चना के बाद डोर-धागा धारण कर सुख-समृद्धि की कामना की।
कुमाऊं के साथ गढ़वाल के अनेक हिस्सों में भी यह पर्व श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। आठूं के अवसर पर भगवान शिव यानी महेश्वर की प्रतिमा स्थापित कर गौरा-महेश की आराधना की जाती है।
धर्म, प्रकृति और लोकजीवन का संगम
दरअसल, सातों-आठों की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि इसमें धर्म और लोकजीवन अलग-अलग दिखाई नहीं देते। पूजा के साथ सामाजिक मेल-मिलाप है, गीतों के साथ इतिहास है, अनुष्ठानों के साथ प्रकृति है और उत्सव के साथ पीढ़ियों को जोड़ने वाली स्मृति है।
बदलती जीवनशैली और आधुनिकता की तेज रफ्तार के बीच जब कई लोकपरंपराएं धीरे-धीरे सीमित होती जा रही हैं, ऐसे समय में सातों-आठों जैसे पर्वों का महत्व और बढ़ जाता है। ये पर्व याद दिलाते हैं कि संस्कृति संग्रहालयों में सुरक्षित कोई पुरानी वस्तु नहीं, बल्कि एक जीवित जीवन-पद्धति है, जिसे लोग हर साल अपने व्यवहार, गीतों, रीति-रिवाजों और सामूहिक सहभागिता के जरिए फिर से जीवंत करते हैं।
पहाड़ की जीवित सांस्कृतिक विरासत
सातों-आठों इसलिए सिर्फ कैलेंडर की एक तारीख नहीं है। यह पहाड़ की उस जीवित विरासत का उत्सव है, जिसमें गौरा के गीत हैं, महेश्वर की आराधना है, नौले का पानी है, आंगन की रौनक है और पीढ़ियों से चली आ रही आत्मीयता की गर्माहट है।
यही आत्मीयता पहाड़ को केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान बनाती है।
