प्राचीन काल से ‘उत्तर की काशी’ के नाम से विख्यात बागेश्वर आज भी है खास
Uttarakhand: प्राचीन काल से ‘उत्तर की काशी’ के नाम से विख्यात बागेश्वर आज भी अपनी आध्यात्मिक आभा, प्राकृतिक सौंदर्य और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के कारण विशिष्ट पहचान रखता है। सदियों पुराने इतिहास को अपने भीतर समेटे बागेश्वर जिले ने अपने गठन के 29 वर्ष पूरे कर लिए हैं। इन तीन दशकों में जिले ने विकास की अनेक यात्राएं तय की हैं, जबकि इसकी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहचान आज भी उतनी ही जीवंत है।
सरयू-गोमती के संगम पर बसा है नगर
कुमाऊं अंचल में बसा बागेश्वर नगर पवित्र सरयू और गोमती नदियों के संगम पर स्थित है। चारों ओर फैली हरियाली, पर्वतीय ढलानें और हिमालय की भव्य चोटियां इसकी प्राकृतिक सुंदरता को और निखारती हैं। नदियों का यह पावन संगम सदियों से आस्था और धार्मिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र रहा है।

ग्लेशियरों का प्रवेशद्वार है बागेश्वर
बागेश्वर केवल धार्मिक दृष्टि से ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि यह कुमाऊं हिमालय के विश्वप्रसिद्ध ग्लेशियरों का प्रवेशद्वार भी है। विश्वप्रसिद्ध पिंडारी ग्लेशियर की यात्रा का मार्ग इसी क्षेत्र से होकर गुजरता है। वहीं सुंदरढूंगा और कफनी ग्लेशियरों की ओर जाने वाले मार्ग भी बागेश्वर क्षेत्र से जुड़ते हैं। यही कारण है कि यह क्षेत्र ट्रेकिंग, पर्वतारोहण, प्रकृति प्रेमियों और हिमालय को करीब से देखने वाले पर्यटकों के लिए विशेष आकर्षण रखता है।
लोक संस्कृति और उत्तरायणी कौतिक
बागेश्वर की पहचान उसकी जीवंत लोक संस्कृति से भी है। ऐतिहासिक नुमाइश मैदान वर्षभर विभिन्न सामाजिक, सांस्कृतिक और सार्वजनिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बना रहता है। वहीं उत्तरायणी कौतिक के दौरान बागेश्वर की सांस्कृतिक रंगत देखते ही बनती है। यह पारंपरिक मेला कुमाऊं की लोक परंपराओं, रीति-रिवाजों, लोककला और सांस्कृतिक विरासत को जीवंत करता है तथा दूर-दूर से लोगों को आकर्षित करता है।जिले के रूप में 29 वर्ष पूरे कर चुका बागेश्वर आज विकास, प्रकृति, आस्था और संस्कृति के बीच संतुलन की एक विशिष्ट कहानी प्रस्तुत करता है। सरयू-गोमती का पावन संगम, हिमालय की विराटता और कुमाऊं की समृद्ध परंपराएं इसे उत्तराखंड के उन चुनिंदा स्थानों में शामिल करती हैं, जहां प्रकृति और संस्कृति एक-दूसरे में घुली-मिली दिखाई देती हैं।
