नई टिहरी। हाईकोर्ट और सरकार के बीच आरक्षण को लेकर जारी कानूनी खींचतान के कारण त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव असमंजस में हैं, लेकिन टिहरी जनपद के भिलंगना ब्लॉक की बासर पट्टी स्थित कफोल गांव के ग्रामीणों ने इस असमंजस से ऊपर उठकर लोकतंत्र की परिपक्वता का परिचय देते हुए निर्विरोध निर्वाचन की परंपरा को आगे बढ़ाया है। गांव में आयोजित एक सामूहिक बैठक में मौजूदा आरक्षण के अनुरूप सर्वसम्मति से राजेंद्र सिंह परमार को फिर से ग्राम प्रधान चुनने पर सहमति जताई गई है।
गौरतलब है कि पृथक उत्तराखंड राज्य के गठन के बाद से कफोलगांव में लगातार निर्विरोध निर्वाचन की परंपरा चली आ रही है, जिससे गांव में आपसी सौहार्द, पारदर्शिता और विकास का वातावरण बना है। अब तक चार बार निर्विरोध ग्राम प्रधान चुने जा चुके हैं और राजेंद्र सिंह परमार को यह सम्मान पांचवीं बार मिलने जा रहा है।
ग्रामीणों का मानना है कि ग्राम प्रधान पद के लिए आपसी समन्वय और एकमत से चयन करने की परंपरा ने गांव को न केवल राजनीतिक विवादों से दूर रखा है, बल्कि विकास कार्यों में निरंतरता और पारदर्शिता भी सुनिश्चित की है। कोर्ट और सरकार के बीच चल रही आरक्षण संबंधी उलझनों को दरकिनार करते हुए गांव ने एक बार फिर यह सिद्ध किया है कि सामाजिक एकता और लोकतांत्रिक विवेक से किसी भी व्यवस्था को सार्थक दिशा दी जा सकती है।
इस सामूहिक निर्णय के दौरान कीर्ति सिंह बिष्ट, सोहन बिष्ट, पूर्व बीडीसी सदस्य जितेंद्र कठैत, जसपाल बिष्ट, नरेंद्र बिष्ट, राजपाल बिष्ट सहित अन्य ग्रामीण मौजूद रहे। सभी ने सर्वसम्मति से राजेंद्र सिंह परमार के अनुभव और नेतृत्व क्षमता पर भरोसा जताया और उन्हें ग्राम विकास की निरंतरता के लिए उपयुक्त व्यक्ति बताया।
कफोल गांव का यह अनुकरणीय उदाहरण न केवल अन्य ग्राम पंचायतों के लिए प्रेरणा है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि लोकतंत्र की असली शक्ति आपसी सहमति, संवाद और सामूहिक निर्णय में निहित होती है।
पंचायत चुनाव पर कानूनी असमंजस के बीच कफोल गांव ने फिर दिखाया लोकतांत्रिक अनुशासन
