नई टिहरी। पहाड़ों को दूर से निहारना और उनकी खूबसूरती में खो जाना आम बात है, लेकिन उन्हीं दुर्गम पहाड़ों को अपना लक्ष्य बनाकर उनकी चोटियों पर तिरंगा फहराने का जज्बा हर किसी में नहीं होता। टिहरी गढ़वाल के युवा पर्वतारोही सार्थक कुड़ियाल ने अपने इसी जुनून, साहस और दृढ़ संकल्प के दम पर हिमालय की 6,137 मीटर ऊंची बेहद चुनौतीपूर्ण श्रीकंठ चोटी का सफल आरोहण कर इतिहास रच दिया है। इस उपलब्धि के साथ वे दुनिया के सबसे युवा श्रीकंठ पर्वतारोही बन गए हैं। उनकी इस सफलता से टिहरी गढ़वाल सहित पूरे उत्तराखंड का गौरव बढ़ा है।

शुक्री गांव से हिमालय की ऊंचाइयों तक का सफर
जनपद टिहरी गढ़वाल के विकासखंड प्रतापनगर के ग्राम शुक्री निवासी सार्थक कुड़ियाल का जन्म अगस्त 2001 में नई टिहरी में हुआ। उनके पिता रमेश कुड़ियाल पेशे से पत्रकार हैं, जबकि माता सरिता कुड़ियाल समाजसेविका हैं। उनकी माता भारत सरकार की महत्वपूर्ण परियोजना महिला समाख्या में जिला समन्वयक के पद पर भी कार्य कर चुकी हैं।
सार्थक की प्रारंभिक शिक्षा ऑल सेंट्स कॉन्वेंट स्कूल और केंद्रीय विद्यालय, नई टिहरी में हुई। इसके बाद उन्होंने देहरादून से आगे की पढ़ाई पूरी की। पढ़ाई के दौरान ही प्रकृति और पहाड़ों के प्रति उनका आकर्षण बढ़ता गया। धीरे-धीरे यही आकर्षण उनके जीवन का जुनून बना और उन्होंने पर्वतारोहण को अपना करियर बनाने का फैसला किया।
निम और अभिमास से हासिल किया पर्वतारोहण का प्रशिक्षण
पर्वतारोहण केवल शारीरिक क्षमता का प्रदर्शन नहीं, बल्कि मानसिक मजबूती, अनुशासन, तकनीकी दक्षता और विषम परिस्थितियों में सही निर्णय लेने की क्षमता की भी परीक्षा है। सार्थक ने इस चुनौती को समझते हुए अपने कौशल को व्यवस्थित प्रशिक्षण के जरिए निखारा।
उन्होंने नेहरू पर्वतारोहण संस्थान (NIM), उत्तरकाशी से बेसिक माउंटेनियरिंग कोर्स, सर्च एंड रेस्क्यू कोर्स तथा एमओआई कोर्स पूरा किया। इसके अतिरिक्त मनाली स्थित अभिमास से एडवांस माउंटेनियरिंग कोर्स भी किया। लगातार प्रशिक्षण और अभ्यास के माध्यम से उन्होंने पर्वतारोहण की तकनीकी बारीकियों में दक्षता हासिल की और विभिन्न चुनौतीपूर्ण चोटियों पर सफल आरोहण कर अपने अनुभव को मजबूत किया।
6137 मीटर ऊंची श्रीकंठ चोटी का आरोहण बड़ी उपलब्धि
समुद्र तल से 6,137 मीटर की ऊंचाई पर स्थित श्रीकंठ चोटी को तकनीकी रूप से बेहद चुनौतीपूर्ण माना जाता है। इस चोटी तक पहुंचने का रास्ता पर्वतारोहियों के धैर्य, कौशल और शारीरिक क्षमता की कठिन परीक्षा लेता है। कम ऑक्सीजन, खड़ी ढलानें और प्रतिकूल मौसम परिस्थितियां इस अभियान को और अधिक जोखिमपूर्ण बना देती हैं।
बताया जाता है कि अब तक इस चोटी पर केवल चार पर्वतारोहण दल ही सफलतापूर्वक आरोहण कर पाए हैं। ऐसे चुनौतीपूर्ण अभियान में सार्थक की सफलता पर्वतारोहण के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा रही है। उनकी इस उपलब्धि ने यह साबित किया है कि मजबूत इच्छाशक्ति और निरंतर अभ्यास के दम पर कठिन से कठिन लक्ष्य भी हासिल किए जा सकते हैं।

मुख्यमंत्री भी कर चुके हैं सम्मानित
सार्थक कुड़ियाल का चयन उत्तराखंड सरकार की ओर से वर्ष 2022-23 में प्रायोजित श्रीकंठ चोटी पर्वतारोहण अभियान के लिए भी हुआ था। इस अभियान में सफलता हासिल करने के बाद उन्हें मुख्यमंत्री द्वारा सम्मानित किया गया था। यह सम्मान उनके पर्वतारोहण के सफर में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि रहा।
युवाओं के लिए प्रेरणा बनी सार्थक की सफलता
सार्थक कुड़ियाल की कहानी केवल एक पर्वतारोहण अभियान की सफलता नहीं, बल्कि सपनों को हकीकत में बदलने के जुनून और संघर्ष की मिसाल है। पहाड़ों की कठिन परिस्थितियों के बीच पले-बढ़े सार्थक ने अपनी मेहनत और समर्पण से साबित किया है कि उत्तराखंड के युवाओं के सपनों की उड़ान हिमालय की चोटियों से भी ऊंची हो सकती है।
सार्थक के लिए श्रीकंठ चोटी का आरोहण अंतिम मंजिल नहीं, बल्कि हिमालय की अनगिनत ऊंचाइयों की ओर बढ़ते सफर का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। पहाड़ों को अपना पहला प्रेम और जीवन का अभिन्न हिस्सा मानने वाले सार्थक की उपलब्धि नई पीढ़ी को अपने लक्ष्य पहचानने, चुनौतियों का सामना करने और पूरे समर्पण के साथ सपनों को साकार करने की प्रेरणा देती है।
टिहरी की धरती से निकलकर हिमालय की ऊंचाइयों पर अपनी पहचान बनाने वाले सार्थक कुड़ियाल आज उत्तराखंड के उन युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत बन गए हैं, जो अपने हौसलों से नई ऊंचाइयां छूने का सपना देखते हैं।
