29 से 31 अक्टूबर तक होगा तीन दिवसीय आयोजन, प्रति-कुलपति साध्वी डॉ. देवप्रिया ने समीक्षा बैठक में दिए दिशा-निर्देश
हरिद्वार। पतंजलि विश्वविद्यालय में 29 से 31 अक्टूबर तक आयोजित होने वाले 52वें अखिल भारतीय प्राच्य विद्या सम्मेलन को भव्य और सुव्यवस्थित बनाने के लिए तैयारियां तेज कर दी गई हैं। सम्मेलन की व्यवस्थाओं को निर्धारित समयसीमा में पूरा करने के उद्देश्य से विश्वविद्यालय प्रशासन, विभिन्न आयोजन समितियां और स्वयंसेवक जुटे हुए हैं।
इसी क्रम में शुक्रवार देर शाम पतंजलि विश्वविद्यालय के सभागार में प्रति-कुलपति साध्वी डॉ. देवप्रिया के नेतृत्व में समीक्षा बैठक आयोजित की गई। बैठक में विभिन्न आयोजन समितियों की कार्यप्रगति की समीक्षा की गई और तैयारियों को समयबद्ध तरीके से पूरा करने के लिए संबंधित अधिकारियों एवं समिति प्रभारियों को आवश्यक दिशा-निर्देश दिए गए।
भारतीय ज्ञान-परंपरा के संरक्षण का महत्वपूर्ण मंच
साध्वी डॉ. देवप्रिया ने कहा कि अखिल भारतीय प्राच्य विद्या सम्मेलन भारतीय ज्ञान-परंपरा, प्राचीन शास्त्रों, दर्शन, संस्कृति और प्राच्य विद्याओं के संरक्षण एवं संवर्धन का महत्वपूर्ण मंच है। यह सम्मेलन देश-विदेश के विद्वानों, शोधकर्ताओं और शिक्षाविदों को भारतीय ज्ञान-विज्ञान की समृद्ध विरासत पर विचार-विमर्श करने का अवसर प्रदान करेगा।
उन्होंने कहा कि इस प्रतिष्ठित सम्मेलन की मेजबानी करना पतंजलि विश्वविद्यालय के लिए गौरव का विषय है। आयोजन को सफल बनाने के लिए सभी समितियों को आपसी समन्वय के साथ कार्य करने, निर्धारित समयसीमा में तैयारियां पूरी करने और व्यवस्थाओं की नियमित समीक्षा करने के निर्देश दिए गए।
अतिथियों की सुविधाओं और व्यवस्थाओं पर जोर
समीक्षा बैठक में सम्मेलन में शामिल होने वाले अतिथियों एवं प्रतिभागियों के लिए बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराने, सुव्यवस्थित वातावरण बनाए रखने और आयोजन की गरिमा के अनुरूप सभी व्यवस्थाएं सुनिश्चित करने पर विशेष जोर दिया गया।
साध्वी डॉ. देवप्रिया ने कहा कि किसी भी बड़े आयोजन की सफलता सामूहिक प्रयास, अनुशासन, समर्पण और सूक्ष्म योजना पर निर्भर करती है। उन्होंने अधिकारियों, समिति प्रभारियों और स्वयंसेवकों से सेवा-भाव के साथ अपने दायित्वों का निर्वहन करने का आह्वान किया।
विश्वविद्यालय प्रशासन तीन दिवसीय सम्मेलन को सफल बनाने के लिए तैयारियों में जुटा है। सम्मेलन के दौरान भारतीय दर्शन, साहित्य, संस्कृति और प्राचीन विद्याओं की प्रासंगिकता पर व्यापक विमर्श किया जाएगा। इससे भारतीय ज्ञान-परंपरा के विभिन्न आयामों को समझने और उनके संरक्षण एवं संवर्धन की दिशा में विचार साझा करने का अवसर मिलेगा।
