देहरादून। विरासत महोत्सव-2026 के अंतर्गत हिमालयन सांस्कृतिक केंद्र, नींबूवाला में आयोजित विरासत साधना में बुधवार को 20 विद्यालयों के विद्यार्थियों ने गायन प्रस्तुतियों के माध्यम से अपनी-अपनी प्रतिभा का मनमोहक और आकर्षित करने वाला प्रदर्शन किया।
विरासत साधना में होनहार, ऊर्जावान विद्यार्थियों की प्रस्तुतियों में संगीत के प्रति उनकी लगन और सुरों की साधना प्रत्यक्ष रूप में दिखाई दी। मुख्य बात यह रही कि मधुर बने इस कार्यक्रम में तबला, हारमोनियम और तानपुरे की संगत ने गायन को बहुत ही मधुरता प्रदान की।
विरासत साधना के मंच पर विभिन्न विद्यालयों के विद्यार्थियों ने अपनी प्रस्तुतियों से शास्त्रीय एवं पारंपरिक गायन की सुंदरता को सामने रखा। इस आयोजन ने युवा प्रतिभाओं को मंच पर अपनी कला प्रस्तुत करने और संगीत के क्षेत्र में अपनी रुचि को आगे बढ़ाने का अवसर दिया I विरासत साधना में सरस्वती संगीत मंदिर, ग्ली म्यूजिक अकादमी, माउंट फोर्ट अकादमी, ऐन मेरी स्कूल, वागीश्वरी संगीत साधना, द टोंस ब्रिज स्कूल, पीवाईडीएस लर्निंग अकादमी, वेल्हम बॉयज़ स्कूल, टच वुड स्कूल, कर्नल ब्राउन कैम्ब्रिज स्कूल, न्यू दून ब्लॉसम्स स्कूल, सरगम कला केंद्र, अनंत गोपाल संगीत मंच समिति, होपटाउन गर्ल्स स्कूल, कॉन्वेंट ऑफ जीसस एंड मैरी, केवी ओएनजीसी, ग्राफिक एरा डीम्ड टू बी यूनिवर्सिटी, द एशियन स्कूल, सेंट कबीर अकादमी देहरादून और लतिका के विद्यार्थियों ने पूर्ण दिलचस्पी और साहस दिखाते हुए सहभागिता की।
कार्यक्रम में लतिका के विद्यार्थियों की भागीदारी विशेष रही। विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के विद्यालय लतिका के विद्यार्थियों ने भी गायन के माध्यम से अपनी प्रतिभा प्रस्तुत की। उनकी सहभागिता ने सांस्कृतिक मंचों पर सभी बच्चों को अपनी कला दिखाने के अवसर उपलब्ध कराने के महत्व को रेखांकित किया।विरासत साधना के इस आयोजन ने विद्यार्थियों को अपनी संगीत प्रतिभा प्रदर्शित करने के साथ-साथ भारतीय संगीत परंपरा से जुड़ने का बहुत ही खास अवसर प्रदान किया I सभी बच्चों में अपना अपना प्रदर्शन दिखाने की दिशा में उत्साह नज़र आ रहा था I
विरासत में दिखा देश-विदेशों की सांस्कृतिक झलक का भव्य महाकुंभ
विरासत महोत्सव-2026 में ‘मुक्ति कंट्री ट्रूप’ की प्रस्तुति के माध्यम से छह देशों की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, पारंपरिक नृत्य और कलात्मक अभिव्यक्तियों की अनूठी झलक देखने को मिली। भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (आईसीसीआर) के सहयोग से विरासत में आए कजाकिस्तान, बांग्लादेश, मिस्र, उज्बेकिस्तान, वेनेजुएला और नाइजीरिया के अंतरराष्ट्रीय विद्यार्थियों ने अपने-अपने देशों की पारंपरिक नृत्य शैलियों के माध्यम से वहां की सांस्कृतिक पहचान, लय, भाव-भंगिमाओं और कलात्मक परंपराओं को मंच पर प्रस्तुत किया।
कार्यक्रम में प्रत्येक देश की प्रस्तुति ने उसकी विशिष्ट सांस्कृतिक परंपराओं और पहचान को दर्शाया। समापन में भारतीय शास्त्रीय नृत्य शैली की प्रस्तुति हुई, जिसके बाद ‘शक्ति’ नामक प्रभावशाली प्रस्तुति ने सामर्थ्य, ऊर्जा और एकता का संदेश दिया। विभिन्न देशों के कलाकारों की सहभागिता ने यह दर्शाया कि नृत्य भाषा और भौगोलिक सीमाओं से परे लोगों को जोड़ने का सशक्त माध्यम रहा है। इस सांस्कृतिक संगम ने मित्रता, आपसी सम्मान और विविध संस्कृतियों के बीच सौहार्द की भावना को उजागर किया।
कजाकिस्तान मध्य एशिया और पूर्वी यूरोप में फैला एक अंतर महाद्वीपीय देश है। यह दुनिया का सबसे बड़ा स्थलरुद्ध देश और क्षेत्रफल के लिहाज से नौवां सबसे बड़ा देश है। इसकी राजधानी अस्ताना है, जबकि अल्माटी व्यापार, कला और संस्कृति का प्रमुख केंद्र है। यहां के विशाल घास के मैदान, निचले क्षेत्र, पहाड़ी पठार और पर्वत श्रृंखलाएं इसकी भौगोलिक विविधता दर्शाते हैं I बांग्लादेश की बात की जाए तो वह दक्षिण एशिया का एक ऐसा देश है, जिसकी राजधानी ढाका देश का राजनीतिक, वित्तीय और सांस्कृतिक केंद्र है। भारतीय उपमहाद्वीप का हिस्सा होने के कारण इसकी कला और सांस्कृतिक विरासत भी समृद्ध रही है। यहां के लोकनृत्य, लोकसंगीत और पारंपरिक कलाएं सांस्कृतिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। कृषि प्रधान समाज की परंपराओं के अनुरूप यहां के प्रमुख त्योहारों, खानपान और संगीत का संबंध फसल और कटाई के मौसम से भी जुड़ा रहा है। जबकि मिस्र उत्तर-पूर्वी अफ्रीका और दक्षिण-पश्चिमी एशिया में स्थित एक अंतरमहाद्वीपीय देश है। इसकी राजधानी काहिरा दुनिया के प्राचीन शहरों में शामिल है और समृद्ध कला एवं सांस्कृतिक विरासत के लिए जानी जाती है। मिस्र दुनिया की सबसे प्राचीन और लंबे समय तक कायम रहने वाली सभ्यताओं में से एक का घर रहा है। फराओ, चित्रलिपि, गीज़ा के पिरामिड और विशाल स्फिंक्स इसकी ऐतिहासिक पहचान के प्रमुख प्रतीक हैं। नील नदी और स्वेज नहर समुद्री परिवहन तथा वैश्विक जलमार्गों के इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। इसके अलावा उज्बेकिस्तान मध्य एशिया का दोहरा स्थलरुद्ध देश है, जिसकी राजधानी और सबसे बड़ा शहर ताशकंद है। समरकंद, बुखारा और खीवा जैसे ऐतिहासिक शहर इसकी सांस्कृतिक पहचान का अहम हिस्सा हैं। मस्जिदों, मकबरों और स्थापत्य कला के लिए प्रसिद्ध यह देश प्राचीन सिल्क रूट से जुड़ा रहा है, जो चीन को भूमध्यसागरीय क्षेत्र से जोड़ने वाला महत्वपूर्ण व्यापारिक मार्ग था।
वेनेजुएला दक्षिण अमेरिका के उत्तरी तट पर स्थित है और अपनी विविध प्राकृतिक सुंदरता के लिए जाना जाता है। इसकी राजधानी कराकस देश का सबसे बड़ा और ऐतिहासिक महत्व वाला शहर है। दुनिया के सबसे बड़े प्रमाणित तेल भंडारों, प्राकृतिक स्थलों और विश्व के सबसे ऊंचे जलप्रपात एंजेल फॉल्स के लिए प्रसिद्ध इस देश के भौगोलिक परिदृश्य में कैरेबियाई तट, एंडीज पर्वत, ओरिनोको नदी के मैदान और अमेजन वर्षावन शामिल हैं।
तथा नाइजीरिया अफ्रीका के पश्चिमी तट पर स्थित एक संघीय गणराज्य है, जिसकी राजधानी अबुजा है। यह अफ्रीका की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, जिसमें पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस और कृषि क्षेत्र की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। 250 से अधिक जातीय समूहों वाला यह देश अपनी विविध कला, संस्कृति, विरासत और रचनात्मक उद्योगों के लिए विश्व स्तर पर पहचान रखता है। इसका फिल्म उद्योग भी इसकी प्रभावशाली सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
विरासत के मंच को बेहतरीन रूप में सुशोभित करते हुए ‘मुक्ति कंट्री ट्रूप’ की प्रस्तुति ने छह देशों की सांस्कृतिक विविधता को एक मंच पर लाकर यह संदेश दिया कि कला और नृत्य विभिन्न परंपराओं के बीच संवाद स्थापित करते हैं।
बांसुरी पर ख़्याल गायिकी का चला अद्भुत जादू…..
विरासत महोत्सव- 2026 की शाही सांस्कृतिक संध्या में आज उस समय मधुर-मनोरम खुशबू प्रवाहित हो गई, जब विरासत की इस महफिल में बांसुरी पर ख़्याल गायिकी का अद्भुत जादू अश्विन श्रीनिवासन ने अपने जादुई अंदाज़ में कर डाला I उनकी शानदार और खुशबूदार गायिकी ने सभी को मदहोश तथा दीवाना बना दिया I प्रख्यात बांसुरी वादक अश्विन श्रीनिवासन ने अपनी बांसुरी वादन प्रस्तुति से शास्त्रीय संगीत की मधुरता और रागों की विविधता को सामने रखा। उनकी प्रस्तुति में भारतीय शास्त्रीय संगीत की गहराई और सुरीली अभिव्यक्ति का अनुभव देखने को मिला। प्रस्तुति की शुरुआत राग पूरिया धनाश्री के विलंबित खयाल से हुई। इसके बाद राग बिहाग की प्रस्तुति ने संगीत की भावपूर्ण छटा बिखेरी। कार्यक्रम के अगले चरण में ग़ज़लों की प्रस्तुति ने संध्या को एक अलग संगीतमय रंग प्रदान किया। इस दौरान तबले पर अभिषेक मिश्रा ने संगत की, जबकि बांसुरी पर हिमांशु कानेकर का खूबसूरत साथ रहा। कलाकारों की सुरमयी जुगलबंदी ने प्रस्तुति को और प्रभावशाली बनाया तथा श्रोताओं को भारतीय संगीत की विविध रंगतों से रूबरू कराया।
इस प्रकार की विश्वविख्यात शख्सियत के संगीतमय दुनिया में झांककर देखा जाए तो…..अश्विन श्रीनिवासन की संगीत यात्रा महज दो साल की उम्र में शुरू हुई, जब उन्होंने अपनी माता श्रीमती पार्वती कृष्णमूर्ति के कुशल मार्गदर्शन में सितार सीखना शुरू किया। इसके बाद उन्होंने बांसुरी बजाना शुरू किया और अपने गुरु पंडित वेंकटेश गोडखिंदी और पंडित पुंडलिक शेनॉय के मार्गदर्शन में अपने कौशल को निखारा।
उनकी यात्रा में एक नया मोड़ तब आया जब उन्होंने ख्याल गायकी अंग के जादू को बड़े ही सहज़ होकर जाना और मुंबई में पद्मभूषण डॉ. एन राजम के मार्गदर्शन में अपना प्रशिक्षण जारी रखा। मुंबई में रहते हुए अश्विन को प्रतिष्ठित भारत रत्न लता मंगेशकर के लिए 17 वर्षों तक संगीत संयोजन और निर्माण करने का खूबसूरत अवसर मिला। उन्होंने लता मंगेशकर की अधिकांश गैर-फिल्मी रचनाओं पर काम किया, जिन्होंने भारतीय संगीत जगत पर अमिट छाप छोड़ी है।
उन्होंने संगीतकार-निर्माता नितिन साहनी, अकादमी पुरस्कार विजेता गुस्तावो सांताओलाला, गैब्रियल यारेड और एआर रहमान तथा ग्रैमी पुरस्कार विजेता इमोजेन हीप और जॉस स्टोन जैसे प्रख्यात संगीतकारों के साथ काम किया है। बांसुरी पर ‘ख्याल गायकी अंग’ के प्रति उनके अद्वितीय तकनीकी दृष्टिकोण के लिए वे ख़ास तौर पर जाने जाते हैं।
प्रियंका बर्वे के गीतों और ग़ज़लों ने बांधा समां, सुरों में जीवंत हुई संगीत की विरासत
विरासत महोत्सव-2026 की सांस्कृतिक संध्या में गायिका प्रियंका बर्वे की ‘गीत एवं ग़ज़ल’ प्रस्तुति ने श्रोताओं को भारतीय संगीत की समृद्ध परंपरा और सदाबहार नग़मों की दुनिया से रूबरू कराया। अपनी सुरीली आवाज़ के माध्यम से उन्होंने बेगम अख्तर, फ़रीदा ख़ानम, मेहदी हसन और लता मंगेशकर जैसे महान कलाकारों की सांगीतिक विरासत को मंच पर जीवंत किया। इस शानदार प्रस्तुति में ‘मोहब्बत करने वाले’, ‘केसरिया बालम’, लता मंगेशकर का सदाबहार गीत ‘ आ लग जा गले’, ‘तेरी खुशबू में बसा ख़त’, ‘छाप तिलक’ और ‘आज जाने की ज़िद न करो’ जैसी लोकप्रिय रचनाएं शामिल रहीं। प्रियंका बर्वे के साथ कीबोर्ड पर विशाल धुमाल, एसराज पर अरशद खान, तबले पर सोहम गोराने और हारमोनियम पर नुसरत, अपूर्व पेटकर ने संगत की। कलाकारों की सुरमयी संगत ने प्रत्येक रचना के भाव और उसकी सांगीतिक खूबसूरती को और निखारा।
प्रियंका बर्वे ने सदाबहार गीतों और ग़ज़लों के माध्यम से यह दर्शाया कि संगीत समय के साथ आगे बढ़ता है, लेकिन उसकी भावनाएं और आत्मा पीढ़ियों को जोड़कर रखती हैं।
प्रियंका बर्वे एक प्रख्यात पार्श्व गायिका हैं, जिनकी असाधारण प्रतिभा ने दो दशकों से अधिक समय तक मराठी और हिंदी फिल्म उद्योगों को सुशोभित किया है। दो महान संगीतकारों-विद्वान शास्त्रीय गायक पंडित पद्मकर बर्वे और अपने समय की सबसे प्रसिद्ध पार्श्व गायिका मालती पांडे- बर्वे की पोती के रूप में जन्मीं प्रियंका बचपन से ही संगीत में डूबी रहीं। उन्होंने मात्र तीन वर्ष की आयु से ही संगीत सीखना शुरू कर दिया था। उनका करियर विभिन्न शैलियों और विधाओं तक फैला हुआ है।
उन्होंने संगीत मनपमन, मी वासनराव, पानीपत और आनंदी गोपाल जैसी कई फिल्मों में अपनी छाप छोड़ी है। प्रियंका ने भावगीत, ठुमरी, ग़ज़ल, सूफी, लोकगीत, नाट्यगीत, बॉलीवुड, लावणी आदि कई संगीत विधाओं में महारत हासिल की है, जो उनकी अविश्वसनीय बहुमुखी प्रतिभा और विविध संगीत परंपराओं की गहरी समझ को दर्शाती है। सुपरहिट मुगल-ए-आज़म कॉन्सर्ट में अनारकली के रूप में उनके अविस्मरणीय प्रदर्शन ने उन्हें संगीत जगत की अग्रणी गायिकाओं में से एक के रूप में और भी मजबूत बना दिया। प्रियंका बर्वे एक वैश्विक कलाकार हैं, जिनका संगीत दुनिया भर के श्रोताओं को मंत्रमुग्ध करता है। उनका यूट्यूब चैनल 50 से अधिक देशों में श्रोताओं तक पहुंचता है, और उन्होंने अमेरिका, ब्रिटेन, स्विट्जरलैंड, कतर, ओमान, सिंगापुर और मलेशिया जैसे विभिन्न देशों में सफलतापूर्वक प्रदर्शन किया है। उन्हें कई पुरस्कार और सम्मान प्राप्त हुए हैं,जिससे उनकी ख्याति में चार-चांद लग गए I
