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अठूरवाला की रामलीला में जीवंत हुई रामायण, दशरथ-कैकेयी संवाद ने दर्शकों की आंखें की नम

 देहरादून। अठूरवाला सांस्कृतिक मंच की ओर से आयोजित द्वितीय भव्य श्रीरामलीला-2026 में मंगलवार की रात रामायण के प्रसंगों का ऐसा भावपूर्ण मंचन हुआ कि दर्शक भावविभोर हो उठे। वनवास की लीला में छल-प्रपंच, त्याग, धैर्य, वात्सल्य, शोक और भ्रातृप्रेम की मार्मिक अभिव्यक्ति ने दर्शकों की आंखें नम कर दीं। कलाकार अपने पात्रों के भावों में इस कदर डूबे कि अभिनय के दौरान उनकी आंखों से वास्तविक आंसू छलक पड़े।

दशरथ-कैकेयी संवाद बना मुख्य आकर्षण

रामलीला का सबसे प्रभावशाली प्रसंग राजा दशरथ और रानी कैकेयी के बीच संवाद रहा। संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित वरिष्ठ रंगमंच कलाकार डॉ. राकेश भट्ट ने राजा दशरथ तथा शिक्षाविद् एवं साहित्यकार डॉ. ममता कुंवर ने कैकेयी की भूमिका निभाई। दोनों कलाकारों के सशक्त अभिनय ने मंचन पर अमिट छाप छोड़ी।

डॉ. राकेश भट्ट ने दशरथ के चरित्र को एक ऐसे शौर्यवान, पराक्रमी और वचनबद्ध सम्राट के रूप में प्रस्तुत किया, जो पुत्र के प्रति अथाह प्रेम के बावजूद अपने वचनों से बंधा हुआ है। उनके अभिनय में राजधर्म, पितृप्रेम, स्वाभिमान और असहनीय पीड़ा का प्रभावशाली संगम देखने को मिला।

वहीं, डॉ. ममता कुंवर ने कैकेयी के चरित्र के माध्यम से मातृत्व, पुत्रमोह, मानसिक द्वंद्व, हठ और अंतर्मन की पीड़ा को जीवंत कर दिया। दोनों कलाकारों के संवाद, स्वर के उतार-चढ़ाव और स्वाभाविक भाव-भंगिमाओं ने दृश्य को इतना सजीव बनाया कि दर्शक भावनात्मक रूप से उससे जुड़ गए।

लक्ष्मण के भ्रातृप्रेम और सीता के समर्पण ने किया भावुक

वनवास के प्रसंग में लक्ष्मण के भ्रातृप्रेम और माता सीता के समर्पण ने भी दर्शकों को भावविभोर किया। परिवार से बिछोह और अयोध्या में छाए शोक के दृश्यों में कलाकारों की भावपूर्ण प्रस्तुति ने रामायण के आदर्शों को साकार किया।

इस मंचन की विशेषता यह रही कि कलाकार केवल संवादों की प्रस्तुति तक सीमित नहीं रहे, बल्कि अपने पात्रों के सुख-दुःख और मानसिक संघर्ष को भी प्रभावी ढंग से अभिव्यक्त करते नजर आए। कहीं पिता की विवशता दिखाई दी, तो कहीं मां का अंतर्द्वंद्व, भाई के प्रति अगाध प्रेम और मर्यादा के लिए त्याग का सर्वोच्च आदर्श।

दर्शकों ने कलाकारों के अभिनय और प्रस्तुति की सराहना की। अठूरवाला की रामलीला ने एक बार फिर भारतीय सांस्कृतिक परंपरा, पारिवारिक मूल्यों और मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के आदर्शों को मंच के माध्यम से जीवंत कर दिया।

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