देहरादून। भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद (ICFRE) के अंतर्गत सतत भूमि प्रबंधन उत्कृष्टता केंद्र (CoE-SLM) द्वारा विश्व मरुस्थलीकरण एवं सूखा रोकथाम दिवस (WDCDD) 2026 के अवसर पर एक राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस वर्ष की वैश्विक थीम “Rangelands: Recognize. Respect. Restore.” रही, जो रेंजलैंड एवं चरागाही पारितंत्रों की जैवविविधता संरक्षण, आजीविका समर्थन तथा पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित करती है।
संगोष्ठी के दौरान रेंजलैंड्स के आर्थिक, पारिस्थितिक एवं सांस्कृतिक महत्व पर विस्तृत चर्चा की गई। वक्ताओं ने स्वदेशी एवं पशुपालक समुदायों को रेंजलैंड्स के पारंपरिक संरक्षकों के रूप में पहचानने और सम्मान देने की आवश्यकता पर बल दिया। साथ ही, रेंजलैंड्स की पुनर्स्थापना एवं सतत प्रबंधन के लिए निवेश बढ़ाने का आह्वान किया गया।

कार्यक्रम में प्रतिष्ठित विशेषज्ञों द्वारा चार विषयगत व्याख्यान प्रस्तुत किए गए। डॉ. ए.के. शुक्ला, आईसीएआर–भारतीय घास भूमि एवं चारा अनुसंधान संस्थान (IGFRI) ने “भारत में रेंजलैंड्स एवं पशुपालक प्रणालियों का पारिस्थितिक महत्व” विषय पर व्याख्यान दिया। डॉ. राजकमल गोस्वामी, अशोका ट्रस्ट फॉर रिसर्च इन इकोलॉजी एंड द एनवायरनमेंट (ATREE) ने “रेंजलैंड क्षरण एवं जैवविविधता संरक्षण” विषय पर अपने विचार साझा किए। डॉ. रंजना नेगी, हिमालयन वन अनुसंधान संस्थान (HFRI) ने “अल्पाइन एवं उच्च हिमालयी घास भूमियों की पुनर्स्थापना” विषय पर महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान की। वहीं, धीरज मित्तल, गुजरात वन विभाग ने “बन्नी घास भूमि पुनर्स्थापना एवं सामुदायिक आधारित परिदृश्य प्रबंधन” से प्राप्त अनुभव साझा करते हुए सामुदायिक सहभागिता की भूमिका पर प्रकाश डाला।
संगोष्ठी में ICFRE मुख्यालय तथा इसके विभिन्न संस्थानों के अधिकारियों एवं वैज्ञानिकों ने सक्रिय सहभागिता की। यह कार्यक्रम सतत रेंजलैंड प्रबंधन, पारितंत्र पुनर्स्थापना तथा जैवविविधता संरक्षण से संबंधित ज्ञान साझा करने और विचार-विमर्श के लिए एक प्रभावी मंच सिद्ध हुआ।
