
देवेंद्र गुसाईं/ चमोली गढ़वाल। उत्तराखंड के सीमांत जनपद चमोली का ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक धरोहरों से जुड़ा गौचर मेला जो 14 नवंबर से आरंभ हो रहा है। यह मेला न केवल लोक संस्कृति का प्रतीक है, बल्कि सीमांत क्षेत्रों के तिब्बत-उत्तराखंड व्यापारिक संबंधों की जीवंत याद भी है।

तिब्बत से जुड़ा व्यापारिक इतिहास
कभी यह मेला “हाट बाजार” के रूप में दो देशों — भारत और तिब्बत — के बीच व्यापार का केंद्र हुआ करता था।सीमांत जनपदों के भोटिया जनजाति के व्यापारी, जो तिब्बत से वस्तुओं का व्यापार करते थे, ने इस हाट बाजार की नींव रखी। वे तिब्बत से चट्टानी नमक, शिलाजीत, गर्म वस्त्र, घोड़े, बकरियाँ, फरन, चांदी के आभूषण, जड़ी-बूटियाँ, जहरमोड़ा, कस्तूरी, सुहागा आदि वस्तुएँ लाकर गौचर में बेचते थे।

अंग्रेजी शासन और मेले का प्रारंभ (1943)
इस परंपरागत हाट बाजार की अहमियत अंग्रेजी हुकूमत ने भी मानी, और इसे औपचारिक रूप देने की पहल की।वर्ष 1943 में तत्कालीन गढ़वाल के डिप्टी कमिश्नर आर. वी. वनड़ी के सहयोग से इसे विधिवत रूप से “गौचर मेला” का स्वरूप दिया गया।

मेले की स्थापना में नीती-माना घाटी के प्रमुख भोटिया व्यापारी — स्व. बाला सिंह पाल, पान सिंह बंमपाल, और गोविंद सिंह राणा — का विशेष योगदान रहा। इन सभी ने प्रतिष्ठित पत्रकार गोविंद प्रसाद नौटियाल के नेतृत्व में प्रशासन के समक्ष प्रस्ताव रखकर इस ऐतिहासिक मेले की नींव रखी।

हाट से मेले तक – परंपरा की यात्रा
शुरुआत में यह मेला सीमांत व्यापार तक सीमित था, लेकिन समय के साथ यह एक राजकीय औद्योगिक, सांस्कृतिक और विकासमूलक मेला बन गया।हर वर्ष यहाँ कृषि, पशुपालन, हस्तशिल्प, उद्योग, पर्यटन, संस्कृति और लोककला से जुड़ी प्रदर्शनी एवं आयोजन होते हैं। यहीं से स्थानीय उत्पादों को बाजार मिलता है और युवाओं को स्वरोजगार के नए अवसर।

दो सीमांत जिलों की साझी परंपरा
गौचर की तरह ही पिथौरागढ़ जिले में भी जौलजीबी मेला इसी परंपरा का हिस्सा है। जौलजीबी के व्यापारी भी तिब्बत से रोजमर्रा के उपयोग की वस्तुएँ लेकर यहाँ हाट लगाते थे। दोनों मेलों ने मिलकर सीमांत इलाकों को संस्कृति, व्यापार और पारंपरिक एकता की डोर से बाँधा, किन्तु एसा नहीं है कि हमेशा ही सब ठीक चलता रहा हो कई बार आपदा एवं स्थानीय कारकों के कारण मेला बाधित भी रहा एवं नहीं हो सका

गौचर मेला 2025 – 73वां अध्याय
इस वर्ष गौचर मेला अपना 73वाँ संस्करण मना रहा है, जो 14 नवंबर 2025 से प्रारंभ होगा। यह मेला केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि पहाड़ की जीवंत संस्कृति, आपसी भाईचारे और आत्मनिर्भरता का प्रतीक बन चुका है।

आज का गौचर मेला – आधुनिकता और परंपरा का संगम
आज यह मेला अपनी पारंपरिक पहचान को सँजोए हुए आधुनिक तकनीक, उद्योग, कृषि, शिक्षा और रोजगार से भी जुड़ चुका है।यहाँ हर वर्ष लाखों लोग आते हैं, स्थानीय शिल्पकारों और कलाकारों की प्रतिभा देश-दुनिया तक पहुँचती है।

गौचर मेला 2025“जहाँ परंपरा बोलती है, संस्कृति नृत्य करती है, और विकास मुस्कुराता है।”
